ज्ञानवापी मामला: मध्यस्थता की कोशिश नाकाम, दोनों पक्षों ने समझौते से किया इनकार; अब अदालत के फैसले का इंतजार
श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद विवाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मध्यस्थता (मेडिएशन) के जरिए समाधान निकालने की कोशिश फिलहाल सफल नहीं हो सकी। मंगलवार को मध्यस्थता कोर्ट में हुई सुनवाई पूरी हो गई, जहां हिंदू और मुस्लिम—दोनों पक्षों ने स्पष्ट रूप से किसी भी प्रकार के समझौते से इनकार कर दिया। दोनों पक्षों ने कहा कि वे अपने-अपने दावों पर कायम हैं और अब अंतिम निर्णय अदालत ही करेगी।
चार पत्रावलियों पर हुई सुनवाई
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— The Varanasi News (@thevaranasinews) July 14, 2026
मध्यस्थता की कार्यवाही के दौरान विवाद से जुड़ी चार अलग-अलग पत्रावलियों पर चर्चा की गई। सभी संबंधित पक्षकार और उनके अधिवक्ता कोर्ट में उपस्थित हुए। मध्यस्थता के दौरान सभी पक्षों से उनकी राय ली गई, लेकिन किसी ने भी समझौते के लिए सहमति नहीं दी। दोनों पक्षों ने कहा कि वे कानूनी प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखेंगे और अदालत का जो भी फैसला होगा, उसे स्वीकार करेंगे।
हिंदू पक्ष बोला- "मंदिर चाहिए, समझौता संभव नहीं"
मंदिर पक्ष की ओर से अधिवक्ता रेखा पाठक, शैलेंद्र पाठक सहित अन्य प्रतिनिधि उपस्थित रहे। हिंदू पक्ष ने कहा कि विवादित स्थल पर आदि-विश्वेश्वर का मंदिर है और वह प्राचीन काल से अस्तित्व में रहा है। उनका कहना है कि वहां नियमित पूजा-अर्चना का अधिकार मिलना चाहिए और इस मामले में किसी तरह का समझौता संभव नहीं है।
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मुस्लिम पक्ष भी वार्ता में शामिल, लेकिन समझौते से इनकार
चर्चा थी कि मुस्लिम पक्ष मध्यस्थता प्रक्रिया का बहिष्कार कर सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुस्लिम पक्ष की ओर से अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के प्रतिनिधि और अधिवक्ता मध्यस्थता में शामिल हुए। हालांकि उन्होंने भी किसी समझौते पर सहमति नहीं जताई और कहा कि विवाद का अंतिम समाधान न्यायालय के फैसले से ही होगा।
सुप्रीम कोर्ट की पहल को झटका
दोनों पक्षों के रुख के बाद कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर शुरू की गई मध्यस्थता प्रक्रिया फिलहाल किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकी। दोनों पक्ष अपने-अपने दावों पर अडिग रहे, जिसके चलते सहमति का कोई रास्ता नहीं निकल पाया।
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वहीं मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह भूमि सदियों से वक्फ की संपत्ति है और यहां नियमित रूप से नमाज अदा की जाती रही है। साथ ही वह पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 का हवाला देता है, जिसके अनुसार 15 अगस्त 1947 को किसी धार्मिक स्थल का जो स्वरूप था, उसे बदला नहीं जा सकता।
एएसआई सर्वे और अदालतों में लंबित मामला
मंदिर पक्ष की मांग पर वाराणसी जिला जज की अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से सर्वे कराया था। सर्वे रिपोर्ट में मंदिर से जुड़े अवशेष मिलने का दावा किया गया है, जबकि मुस्लिम पक्ष इन निष्कर्षों से असहमत है।


