कागजी सड़क चालू, जमीनी रास्ता गायब! 25 मीटर की दूरी के लिए 3 किलोमीटर का चक्कर, ग्रामीणों ने DM से कहा—आकर खुद देख लें
बाबतपुर एयरपोर्ट टनल परियोजना के नाम पर सड़क बंद किए जाने के बाद सिसवां और आसपास के गांवों के लोगों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। सर्विस लेन का काम अब तक शुरू नहीं हुआ है, जबकि बारिश के मौसम में ग्रामीणों को रोजाना भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों से इस्तेमाल हो रही मुख्य सड़क को खत्म कर दिया गया, लेकिन उसके बदले आज तक ऐसी वैकल्पिक सड़क तैयार नहीं की गई, जिससे सामान्य आवागमन सुचारु रूप से हो सके।
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सरकारी रिपोर्ट में दावा—आवागमन बाधित नहीं
इस मामले को दी वाराणसी न्यूज़ ने प्रमुखता से उठाया था। खबर प्रकाशित होने के बाद प्रशासन की ओर से जांच कराई गई। 1 जून 2026 को उप जिलाधिकारी पिंडरा की ओर से जिलाधिकारी को भेजी गई रिपोर्ट में तहसीलदार पिंडरा की जांच आख्या का हवाला दिया गया है। इसमें कहा गया कि ग्राम सिसवां में एयरपोर्ट टनल मार्ग का काम प्रगति पर है और भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई पूरी हो चुकी है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि मार्ग बंद होने से आवागमन बाधित नहीं है तथा ग्रामीण सिसवां के मुख्य मार्ग से नेशनल हाईवे तक जा सकते हैं।
ग्रामीणों का सवाल—अगर रास्ता है तो 3 किलोमीटर का चक्कर क्यों?
ग्रामीण अब इसी सरकारी रिपोर्ट पर सवाल खड़े कर रहे हैं। उनका कहना है कि मामला भूमि अधिग्रहण का नहीं, बल्कि मौजूद सड़क के खत्म हो जाने के बाद वैकल्पिक व्यवस्था का है। ग्रामीणों का आरोप है कि जिस सड़क से उनका नियमित आवागमन होता था, वह अब मौके पर नहीं है और दूसरी तरफ जाने के लिए उन्हें करीब तीन किलोमीटर का अतिरिक्त रास्ता तय करना पड़ रहा है।
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ग्रामीणों की मांग—जिलाधिकारी खुद करें मौका मुआयना
ग्रामीणों ने अब जिलाधिकारी वाराणसी से स्वयं मौके पर पहुंचकर स्थलीय निरीक्षण यानी मौका मुआयना करने की मांग की है। उनका कहना है कि कागजों में रास्ता उपलब्ध होने की बात कही जा रही है, जबकि जमीन पर ग्रामीणों को रोजाना परेशानी झेलनी पड़ रही है।
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ग्रामीणों ने मांग की है कि सर्विस लेन का काम तत्काल शुरू कराया जाए, तब तक सुरक्षित वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था हो और परियोजना से प्रभावित सड़क के मामले में जिम्मेदार विभाग/कार्यदायी संस्था की भूमिका की भी जांच की जाए।
अब ग्रामीणों का सीधा सवाल है—जब सरकारी रिपोर्ट में कहा गया था कि आवागमन बाधित नहीं है, तो आज भी उन्हें 25 मीटर की दूरी के लिए करीब 3 किलोमीटर का चक्कर क्यों लगाना पड़ रहा है? वाराणसी के जिलाधिकारी खुद मौके पर पहुंचकर इस ‘कागजी रास्ते’ और ‘जमीनी रास्ते’ का फर्क क्यों नहीं देख लेते?




