पुलिस कस्टडी मौत मामले में बड़ा फैसला: प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. के.के. जैन समेत तीन को सजा
वाराणसी की विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण) अमित कुमार तिवारी की अदालत ने पुलिस कस्टडी में हुई मौत के 29 वर्ष पुराने बहुचर्चित मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. के.के. जैन समेत तीन लोगों को दोषी करार देकर सजा सुनाई है। अदालत ने सेवानिवृत्त दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह, सेवानिवृत्त दरोगा राधेश्याम सिंह तथा पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक डॉ. के.के. जैन को विभिन्न धाराओं में दोषी पाते हुए कारावास एवं जुर्माने की सजा सुनाई।
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क्या था मामला?
अभियोजन पक्ष के अनुसार जंसा थाना क्षेत्र के बखरिया गांव निवासी राजेंद्र प्रसाद सिंह 5 फरवरी 1997 को अपने बेटे की दवा लेने वाराणसी आए थे। इसी दौरान महानगर बस में सीट को लेकर उनकी एक यात्री से कहासुनी हो गई। आरोप है कि सुंदरपुर पुलिस चौकी पर तैनात तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह ने राजेंद्र को पकड़कर चौकी ले गए और उन पर यात्री दयाराम की जेब से 100 रुपये चोरी करने का आरोप लगाया।
परिजनों और जांच एजेंसियों के अनुसार पुलिस हिरासत में प्रताड़ना के चलते उसी दिन शाम को राजेंद्र प्रसाद सिंह की मौत हो गई। इसके बाद पुलिस ने मामले को आत्महत्या का रूप देने का प्रयास किया। तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह ने मृतक के खिलाफ चोरी का मुकदमा दर्ज कराया और विवेचना राधेश्याम सिंह को सौंपी गई। विवेचना में मौत को आत्महत्या बताया गया।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर उठे सवाल
मामले में पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक डॉ. के.के. जैन ने अपनी रिपोर्ट में मृत्यु का कारण फांसी लगने से दम घुटना बताया था। हालांकि बाद की जांच में पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कई गंभीर खामियां सामने आईं। रिपोर्ट में गले पर मिले निशानों की माप, शरीर के अंगों की स्थिति तथा अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख नहीं किया गया था।
सीबीसीआईडी जांच में यह भी सामने आया कि जिस शॉल से आत्महत्या किए जाने का दावा किया गया था, वह बरामद नहीं हुआ। वहीं बैरक में पंखा होने के भी पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले।
परिजनों को बताए बिना कर दिया अंतिम संस्कार
मामले का एक गंभीर पहलू यह भी रहा कि राजेंद्र प्रसाद सिंह के परिजनों को सूचना दिए बिना ही पुलिस ने अगले दिन सुबह हरिश्चंद्र घाट पर उनका अंतिम संस्कार करा दिया। मृतक की पत्नी शशिमा देवी ने पुलिस अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन कार्रवाई न होने पर उन्होंने 11 फरवरी 1997 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया।
मानवाधिकार आयोग के हस्तक्षेप से खुला मामला
मानवाधिकार आयोग द्वारा संज्ञान लिए जाने के बाद मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंपी गई। जांच अधिकारी इंस्पेक्टर श्रीकांत पांडेय की रिपोर्ट के आधार पर 22 अप्रैल 1998 को तत्कालीन थाना प्रभारी हसन अब्बास समेत आठ लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया।
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कई आरोपियों की हो चुकी है मौत
मुकदमे के दौरान आरोपित इंस्पेक्टर हसन अब्बास, कांस्टेबल शुभ नारायण सिंह, कांस्टेबल मंगरू पांडेय और कांस्टेबल चंद्रमा चौधरी की मृत्यु हो गई। वहीं अपर नगर मजिस्ट्रेट अवध मणि त्रिपाठी और कविंद्र नारायण सिंह को आरोप निर्धारण के दौरान ही न्यायालय ने उन्मोचित कर दिया था।
अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में कांस्टेबल श्रीनिवास शुक्ला और कांस्टेबल अनिरुद्ध यादव को दोषमुक्त कर दिया। जबकि गवाहों के बयान और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर डॉ. के.के. जैन, नरेंद्र प्रताप सिंह और राधेश्याम सिंह को दोषी ठहराया।
12 गवाहों की गवाही बनी आधार
मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से ज्येष्ठ अभियोजन अधिकारी (सीबीसीआईडी) गंगाशरण ने पैरवी की। अभियोजन ने मृतक की पत्नी समेत कुल 12 गवाहों को अदालत में प्रस्तुत किया। गवाहों के बयान, सीबीसीआईडी जांच रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने तीनों आरोपियों को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई।
करीब तीन दशक तक चले इस मुकदमे के फैसले को पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों के मामलों में जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।


