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“कचौड़ी गली सून कइल बलमू…”: बनारस की तवायफों का दर्दभरा गीत फिर छाया सोशल मीडिया पर

वाराणसी की गलियां सिर्फ धर्म, अध्यात्म और संस्कृति की पहचान नहीं रहीं, बल्कि यहां की संगीत परंपरा ने सदियों तक समाज के दर्द, प्रेम और प्रतिरोध को भी अपनी धुनों में जिंदा रखा। इन्हीं परंपराओं में एक नाम ‘कचौड़ी गली’ लोकगीत का भी है, जो इन दिनों फिर चर्चा में है। हालांकि इस गीत की कहानी सिर्फ विरह तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे बनारस की तवायफों की वह दुनिया भी छिपी है, जिसने इस दर्द को पीढ़ियों तक जिंदा रखा।

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इतिहासकारों और लोकसंगीत से जुड़े जानकारों के अनुसार, 1824 के प्रथम एंग्लो-बर्मी युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने पूर्वांचल, बनारस और मिर्जापुर क्षेत्र के बड़ी संख्या में पुरुषों को जबरन रंगून (अब यांगून, म्यांमार) भेज दिया था। कई लोग मजदूर बनाकर ले जाए गए, तो कई युद्ध में झोंक दिए गए। इस दौरान हजारों महिलाएं अपने पतियों और प्रेमियों से बिछड़ गईं।


इसी दौर में बनारस की तवायफों की महफिलों में एक दर्द भरा लोकगीत गूंजने लगा, जिसे बाद में ‘कचौड़ी गली’ के नाम से पहचान मिली। कहा जाता है कि जब किसी तवायफ का प्रेमी या संरक्षक अंग्रेजों द्वारा रंगून भेज दिया जाता, तब वह अपने विरह और आक्रोश को इसी गीत के जरिए व्यक्त करती थी। धीरे-धीरे यह गीत सिर्फ प्रेम-विरह नहीं रहा, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक सांस्कृतिक प्रतिरोध की आवाज बन गया।

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बनारस की तवायफें केवल नृत्य और गायन तक सीमित नहीं थीं। वे उस दौर की संगीत, कविता और शास्त्रीय परंपरा की संरक्षक मानी जाती थीं। पूर्वी ठुमरी, दादरा, कजरी और चैती जैसी विधाओं को जीवित रखने में उनका बड़ा योगदान रहा। उनकी महफिलें कला और साहित्य की पाठशाला मानी जाती थीं, जहां से कई लोकधुनें समाज तक पहुंचीं।


‘कचौड़ी गली’ भी उन्हीं महफिलों से निकलकर आम लोगों तक पहुंचा। गीत में बनारस की तंग गलियों, सूने घरों और बिछड़ चुके प्रेम की पीड़ा को बेहद मार्मिक तरीके से पिरोया गया है। यही कारण है कि करीब 200 साल बाद भी यह लोकगीत लोगों के दिलों को छू रहा है।


समय के साथ यह गीत लोकगायकों और शास्त्रीय गायिकाओं के जरिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता गया। अब ‘कोक स्टूडियो भारत’ में नए रूप में आने के बाद यह गीत फिर चर्चा में है, लेकिन इसके पीछे छिपी तवायफों की विरह भरी दुनिया और अंग्रेजी शासन के खिलाफ सांस्कृतिक प्रतिरोध की कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक मानी जाती है।


बनारस की कचौड़ी गली आज भले अपने स्वाद और भीड़ के लिए जानी जाती हो, लेकिन इसकी फिजाओं में कभी उन महिलाओं और तवायफों की आवाजें भी गूंजती थीं, जिन्होंने अपने दर्द को संगीत बनाकर इतिहास में अमर कर दिया।