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काशी में ‘चार कंधों’ का अनोखा स्टार्टअप, अपनों ने छोड़ा साथ तो पैसे लेकर अंतिम यात्रा तक पहुंचा रहे शव

मोक्ष की नगरी काशी से बदलते सामाजिक रिश्तों की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो भावुक करने के साथ-साथ सोचने पर मजबूर करती है। यहां अब अंतिम यात्रा के लिए ‘चार कंधे’ भी किराए पर उपलब्ध हैं। कुछ युवाओं ने इसे एक अनोखे स्टार्टअप का रूप दे दिया है, जिसके जरिए उन लोगों को सहारा दिया जा रहा है, जिनकी अंतिम यात्रा में साथ देने के लिए परिवार या रिश्तेदार मौजूद नहीं होते।

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इस व्यवस्था के पीछे की कहानी जितनी अलग है, उतनी ही मार्मिक भी। सिन्ना साहब नाम के एक सेवानिवृत्त अधिकारी की पत्नी के निधन के बाद जब अंतिम संस्कार की तैयारी हुई तो रिश्तेदारों से संपर्क किया गया, लेकिन कई लोगों ने आने से इनकार कर दिया। जीवन में ऊंचे पद पर रहते हुए अकेले रहना पसंद करने वाले सिन्ना साहब को उस वक्त रिश्तों की अहमियत का अहसास हुआ, जब पत्नी की अंतिम यात्रा के लिए कंधा देने वाला कोई अपना मौजूद नहीं था।


ऐसे समय में कुछ नौजवान आगे आए। उन्होंने पैसे लेकर शव को अंतिम संस्कार स्थल तक पहुंचाने और अंतिम यात्रा में कंधा देने की जिम्मेदारी संभाली। यही व्यवस्था धीरे-धीरे एक ऐसे अनोखे ‘चार कंधों के स्टार्टअप’ में बदलती जा रही है, जहां सेवा, रोजगार और इंसानियत तीनों एक साथ दिखाई देते हैं।

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इस काम से जुड़े सुभाष सोनी, दीनदयाल गोंड, रमेश और मनीष पाल बताते हैं कि शुरुआत में उन्होंने इसे कमाई के उद्देश्य से शुरू किया था। लेकिन समय के साथ यह काम उनके लिए सिर्फ पैसे कमाने का जरिया नहीं रहा। उनका कहना है कि जब किसी अकेले व्यक्ति की अंतिम यात्रा में कोई अपना साथ देने के लिए तैयार नहीं होता, तब वे आगे आकर उसकी अंतिम यात्रा पूरी कराने में मदद करते हैं। इससे उन्हें एक अलग तरह का मानवीय संतोष मिलता है।


मोबाइल की दुनिया में रिश्तों से दूर होता समाज


इन युवाओं के मुताबिक आज के दौर में लोग अपनी नौकरी, निजी जिंदगी और मोबाइल की दुनिया में इतने व्यस्त हो गए हैं कि कई बार किसी के अंतिम समय में साथ खड़े होने के लिए भी समय नहीं निकाल पाते। ऐसे में अंतिम यात्रा के लिए ‘चार कंधों’ की जरूरत पड़ना समाज में बदलते रिश्तों की गंभीर तस्वीर पेश करता है।

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काशी में सामने आया यह अनोखा स्टार्टअप जहां एक तरफ जरूरतमंद और अकेले लोगों के लिए सहारा बन रहा है, वहीं दूसरी तरफ यह बड़ा सवाल भी खड़ा करता है कि क्या आधुनिक समाज में रिश्ते इतने कमजोर होते जा रहे हैं कि इंसान की आखिरी यात्रा के लिए भी कंधे किराए पर लेने पड़ रहे हैं?


बाजार की जरूरत, सामाजिक मजबूरी या इंसानियत की नई मिसाल—‘चार कंधों’ का यह स्टार्टअप इन तीनों के बीच खड़ा नजर आता है। लेकिन इतना जरूर है कि जिन लोगों की अंतिम यात्रा में अपनों का साथ नहीं मिलता, उनके लिए ये युवा आखिरी सफर में किसी अपने से कम नहीं साबित हो रहे हैं।