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जलती चिताओं के बीच नगर वधुओं का नृत्य: मणिकर्णिका घाट पर बाबा मसाननाथ को रिझाने की 400 साल पुरानी परंपरा निभाई गई

काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर बुधवार रात एक अनोखा और भावुक दृश्य देखने को मिला, जब जलती चिताओं के बीच नगर वधुओं ने पूरी रात नृत्य और भजन-कीर्तन किया। एक ओर चिताएं जल रही थीं, तो दूसरी ओर बाबा मसाननाथ के दरबार में भक्ति और नृत्य का अद्भुत संगम दिखाई दिया।

नगर वधुओं ने भक्ति भाव से बाबा मसाननाथ को रिझाने के लिए “दुर्गा दुर्गति नाशिनी” और “डिमिग-डिमिग डमरू कर बाजे” जैसे भजन गाए। उन्होंने बाबा से प्रार्थना की कि अगले जन्म में उन्हें इस जीवन 

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से मुक्ति मिले और उन्हें नगर वधु का जीवन न जीना पड़े।

भव्य सजा बाबा मसाननाथ का दरबार

चैत्र नवरात्रि की सप्तमी के अवसर पर बाबा मसाननाथ का दरबार भव्य रूप से सजाया गया। गुलाब, गेंदा, बेला, रजनीगंधा और चमेली के फूलों से श्रृंगार किया गया, भोग अर्पित किया गया और विधिवत आरती की गई। 

इसके बाद नगर वधुओं का मंच सजा, जहां पूरी रात नृत्य प्रस्तुतियां चलीं। बड़ी संख्या में लोग महाश्मशान में मौजूद रहे और इस अनोखे आयोजन को देखा।

400 साल पुरानी परंपरा

मान्यता है कि यह परंपरा करीब 401 साल पुरानी है, जिसे हर साल चैत्र नवरात्रि की सप्तमी तिथि पर निभाया जाता है। इस अवसर पर वाराणसी ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों और अन्य राज्यों से भी नगर वधुएं यहां पहुंचती हैं। खास बात यह है कि इस आयोजन के लिए किसी को औपचारिक निमंत्रण नहीं दिया जाता।

राजा मान सिंह से जुड़ी है परंपरा

इतिहास के अनुसार, 16वीं शताब्दी में राजा मान सिंह ने काशी आकर श्मशान नाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। उस समय उन्होंने मंगल उत्सव आयोजित करने के लिए कलाकारों को 

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आमंत्रित किया, लेकिन संकोचवश उन्होंने आने से इनकार कर दिया।

जब यह बात नगर वधुओं तक पहुंची, तो उन्होंने बिना किसी हिचक के स्वयं आगे आकर बाबा मसाननाथ की महफिल सजाने का निर्णय लिया। उन्होंने राजा को संदेश भेजा कि वे उत्सव में भाग लेने के लिए तैयार हैं। इससे प्रसन्न होकर राजा मान सिंह ने उन्हें सम्मानपूर्वक रथ से बुलवाया। तभी से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है।

मणिकर्णिका घाट पर आयोजित यह कार्यक्रम काशी की अनूठी परंपराओं, आस्था और सामाजिक भावनाओं का प्रतीक है, जहां मोक्ष की नगरी में जीवन, मृत्यु और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।