1932 से चली आ रही परंपरा का निर्वहन: सावन के पहले सोमवार पर हजारों यादव बंधुओं ने बाबा विश्वनाथ का किया जलाभिषेक
सावन के प्रथम सोमवार पर काशी विश्वनाथ धाम में आस्था, परंपरा और शिवभक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। दशकों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए हजारों यादव बंधु गंगा जल लेकर बाबा विश्वनाथ के दरबार पहुंचे और विधि-विधान से जलाभिषेक किया। डमरू की गूंज, हर-हर महादेव के जयघोष और हाथों में बड़े-बड़े कलश लिए श्रद्धालुओं का उत्साह पूरे मार्ग पर आकर्षण का केंद्र बना रहा।
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यादव समाज के श्रद्धालु समूहों में गंगा घाटों से जल लेकर निकले। पारंपरिक वेशभूषा में शिवभक्ति में लीन श्रद्धालु डमरू बजाते हुए मंदिर की ओर बढ़े। कई श्रद्धालुओं ने भगवान शिव और उनके गणों के विभिन्न स्वरूप धारण कर धार्मिक माहौल को और भी भक्तिमय बना दिया। इस दौरान प्रशासन की ओर से सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर श्रद्धालुओं से दौड़कर मंदिर की ओर न जाने की अपील की गई थी, जिसका भक्तों ने पूरी तरह पालन किया।
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— The Varanasi News (@thevaranasinews) August 3, 2026
यादव समाज के प्रभाकर यादव ने बताया कि भगवान शिव को जल अर्पित करने की यह परंपरा वर्षों पुरानी है। उन्होंने कहा, "यादव समाज जगत कल्याण और सुख-समृद्धि की कामना से बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक करता है। मैं स्वयं पिछले 37 वर्षों से लगातार जलाभिषेक कर रहा हूं। सावन के दौरान हम गंगा से जल लाकर बाबा विश्वनाथ को अर्पित करते हैं।"
वहीं श्रद्धालु पप्पू यादव ने बताया कि यह परंपरा उन्हें अपने पूर्वजों से विरासत में मिली है। उन्होंने कहा, "हर वर्ष सावन के पहले सोमवार पर करीब 35 से 40 हजार यादव समाज के श्रद्धालु इस धार्मिक यात्रा में शामिल होते हैं। पहले गंगा घाट से जल लिया जाता है, फिर काशी विश्वनाथ सहित विभिन्न शिवालयों में भगवान शिव का जलाभिषेक किया जाता है।"
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बताया जाता है कि इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 1932 में हुई थी। उस समय देश में भीषण सूखा और अकाल पड़ा था। मान्यता के अनुसार, एक संत-महात्मा ने सुझाव दिया था कि यदि यादव समाज काशी में बाबा विश्वनाथ और अन्य शिवालयों में सामूहिक रूप से जलाभिषेक करेगा तो प्रकृति प्रसन्न होगी और सूखे से राहत मिलेगी। तभी से हर वर्ष सावन के प्रथम सोमवार पर यादव समाज इस परंपरा का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करता आ रहा है।
सावन के पहले सोमवार पर आयोजित इस अनूठी धार्मिक यात्रा ने एक बार फिर काशी की प्राचीन परंपराओं, सामाजिक एकता और शिवभक्ति की अद्भुत मिसाल प्रस्तुत की। हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी और "हर-हर महादेव" के गगनभेदी उद्घोष से पूरा काशी विश्वनाथ धाम शिवमय हो उठा।



